64. *✸ कर चले हम फिदा ✸*
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कर चले हम फिदा जानो तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ll धृ ll
साँस थमती गई नब्ज जमती गई
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया
कट गये सर हमारे तो कुछ गम नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया मरते मरते रहा बांकपन साथियों ll१ ll
जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रूत रोज आती नहीं
हुस्न और इश्क दोनों को रूसवा करे
वह जवानी जो खूं में नहाती नहीं
आज धरती बनी हैं, दुल्हन साथियोंll२l
राह कुरबानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़ीले
फतह का जश्न इस जश्न के बाद हैं
जिंदगी मौत से मिल रही हैं गले
बाँधलो अपने सरसे कफन साथियोंll३
खींच दो अपने खूं से जमीं पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छूने पाए न सीता का दामन कोई
राम हीतुम तुम्ही लक्ष्मण साथियों ll४ l
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